PRANAV BHARDWAJ
Motivational Speaker / Writer

दोस्तो, मेरी हमेशा से यही कोशिश रही कि मैं कुछ ऐसा करूँ, जिससे देश/समाज में रचनात्मक व सकारात्मक परिवर्तन (Creative & Positive change) आ सके। मैंने अपनी इसी सोच के तहत परम पिता परमेश्वर के आशीर्वाद से यह website बनायी है.......

Read More....

Like Us On Face Book Page
guru
Real Life HeroSomething Special

महान वीर और महा बलिदानी व्यक्तित्व : गुरु गोविन्द सिंह जी

By on January 4th, 2017

 

महान वीर और महा बलिदानी व्यक्तित्व : गुरु गोविन्द सिंह जी 

 

दोस्तो,

       एक पिता के ह्रदय में, उसके पुत्र का बहुत ही ख़ास महत्व होता है ! इतिहास में आपको ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोगों ने उचित-अनुचित को पूरी तरह से नजर-अंदाज करते हुए, पुत्र-मोह को सबसे ऊपर रखा ! इसकी सबसे बड़ी मिसाल महाभारत है ! किस तरह से राजा धृतराष्ट्र ने, अपने पुत्र-मोह के कारण, महाभारत जैसा भीषण युद्ध हो जाने दिया ! आज की भारतीय राजनीति और अन्य क्षेत्रों में इस पुत्र-मोह को आसानी से देखा / महसूस किया जा सकता है !

       लेकिन, साहस, त्याग और बलिदान का सबसे बड़ा उदाहरण कायम करते हुए एक पिता ने अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने दो अनमोल पुत्र रत्नों को हँसते-हँसते दीवार में चुनवा दिया ! ऐसे वीर महापुरुष का नाम था, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ! जिनके लिए किसी भी प्रेम से बढ़कर था, मातृभूमि से प्रेम !

दोस्तो,

       देश, उनके अतुल्य त्याग और बलिदान को याद करते हुए, आने वाली 5 Jan 2017 को उनकी 350 वी जयन्ती मनाने जा रहा है ! तो आइये, उनको नमन करें और उनके महान जीवन से प्रेरणा लेकर अपना जीवन देश-सेवा में अर्पित करें…..  

उनका प्रारंभिक जीवन :—

        श्री गुरु गोविन्द सिंह जी का जन्म 22 dec 1666, पटना (बिहार) में हुआ था ! ये नौवें (9th) सिख गुरु श्री तेग बहादुर जी, और माता गुजरी जी की इकलौती संतान थे ! बचपन में इन्हें गोविन्द राय के नाम से जाना जाता था ! चार साल तक पटना में रहने के बाद 1670 में, इनके पिता जी परिवार के साथ पंजाब आ गये और फिर उसके बाद मार्च 1672 में वे, हिमालय की निचली घाटी में स्थित चक्क ननकी नामक स्थान पर जाकर बस गये ।

       वहां गोविन्द जी ने अपनी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की । Chakk Nanki शहर की स्थापना गोबिंद सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर जी ने की थी !  जिसे आज आनंदपुर साहिब के पवित्र नाम से जाना जाता है ।  आज भी उनके जन्मस्थान वाली जगह को “तख़्त श्री पटना हरिमंदर साहिब के पवित्र नाम से जाना जाता है !

       कश्मीरी पंडितों के लिए संघर्ष करते हुए जब पिता गुरु तेगबहादुर जी, शहीद हो गए तब इन्हें March 29, 1676 को सिख धर्म का अगला गुरु बनाया गया । सिख समुदाय में वे आखिरी सिख गुरु थे और इसी कारण से इन्हें परम गुरु, गुरु ग्रन्थ साहिब (Guru Granth Sahib) के नाम से जाना जाता है।

       पिता के शहीद होने के बाद भी, गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपनी शिक्षा-दीक्षा जारी रखी ! यमुना नदी के किनारे एक शिविर में रहकर गुरु गोबिंद जी ने मार्शल आर्ट्स, शिकार, साहित्य और भाषाएँ जैसे संस्कृत, फारसी, मुग़ल, पंजाबी, तथा ब्रज भाषा भी सीखीं । सन 1684 में उन्होंने एक महाकाव्य भी लिखा जिसका नाम है Chandi Di Var !  यह काव्य हिन्दू माता भगवती/दुर्गा/चंडी और राक्षसों के बीच संघर्ष को दर्शाता है ।

गुरु गोबिंद सिंह की तीन पत्नियाँ थी : –

  • 21 जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया । उन दोनों के 3 लड़के हुए : जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह ।
  • 4 अप्रैल, 1684  को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ । उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह ।
  • 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया । वैसे तो उनकी कोई संतान नहीं थी, पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत ही प्रभावशाली रहा ।

सिख-धर्म और देश के विकास में उनका योगदान :

  • मुग़ल शासकों के अत्याचारी शासन से लड़ने के लिए गुरु जी ने, सन 1699 में महान खालसा का निर्माण किया !
  • उन्होंने सिख गुरुओं के सभी महान उपदेशों को गुरु ग्रंथ साहिब में संगृहीत किया !
  • सिखों के नाम के आगे “सिंह” लगाने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी ।
  • गुरुओं के उत्तराधिकारियों की परंपरा को समाप्त करके और गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों के लिए गुरु का प्रतीक बनाने का पावन कार्य उन्हीं के कुशल नेतृत्व में किया गया !
  • युद्ध में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने पंच ककारों को सिखों के लिए अनिवार्य बनाया, जिसमें केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा शामिल हैं ।
  • “चंडी दीवार” नामक गुरु गोबिन्द सिंह जी की रचना, सिख साहित्य में विशेष महत्त्व रखती है ।

      उनकी वीरता इस बात से प्रदर्शित होती है कि, गुरु गोविन्द जी के नेतृत्व में १४ महान युद्ध लडे गये, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी पूजा-स्थल के लोगों को न तो बंदी बनाया और न ही उसको क्षतिग्रस्त किया ।

       गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने अप्रतिम साहस और अमर बलिदान से सिख धर्म को, न सिर्फ एक महान धर्म बनाया बल्कि उन्होंने सिखों के दिल-दिमाग में साहस और कर्तव्य की ऐसी ज्वाला रोशन कर दी कि, वो किसी भी परिस्थिति में देश की रक्षा करने में सबसे आगे रहें ! यही कारण है कि हम, आज भी हमारी फ़ौज में, ज्यादा से ज्यादा सिख भाइयों को देश की सेवा करते हुए देख सकते हो ! 

नौ जवान साथियों के लिए उनका सन्देश :

       एक महान वीर, सैन्य कौशल में निपुण और आदर्श व्यक्तित्व वाले शख्स के रूप में इतिहास हमेशा गुरु गोबिंद सिंह जी को याद रखेगा । वो कहते थे कि अन्याय को सहने वाला व्यक्ति, अन्याय करने वाले व्यक्ति से कम पापी नहीं है, — क्यूंकि अन्याय सहने वाला व्यक्ति, अपने डर के कारण — अन्याय करने वाले को और अधिक शक्ति-शाली बना देता है !

      अतः हमें किसी भी कीमत पर अन्याय का विरोध करना ही चाहिए ! अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए, हमें किसी भी हद तक गुजरने को तैयार रहना चाहिए फिर चाहे इसके लिए हमें हमारे अपनों की या स्वयं खुद का ही बलिदान क्यूँ न करना पड़ेक्यूंकि देश, सभी से बढ़कर होता है !

       उनके जीवन में, ऐसा भी कठिन समय आया जब उन्हें देश और पुत्र में से एक चुनने को कहा गया ! ऐसी विपरीत परिस्थिति में गुरु गोविन्द सिंह जी ने देश को चुना और धर्म और देश की रक्षा की खातिर, देश-सेवा में अपने कई पुत्रो को कुर्बान कर दिया लेकिन हार नहीं मानी !

       गुरु गोबिंद सिंह ने जब देखा कि मुग़ल सेना ने गलत तरीके से युद्ध किया है, और क्रूर तरीके से उनके पुत्रों की हत्या कर दी तो हथियार डाल देने के बजाये गुरु गोबिंद सिंग ने औरन्ज़ेब को एक जित पत्र “ज़फरनामा” जारी किया । इसमें उन्होंने औरंगजेब को मानवता का पाठ पढाया और युद्ध के तौर तरीके बताये ! बाद में इस पत्र को दशम ग्रन्थ में शामिल किया गया !

       गुरु गोबिन्द सिंह जी सिख आदर्शों को जिंदा रखने के लिए किसी भी हद तक गुजरने को तैयार थे । उन्होंने मुग़लों की गलत और अत्याचारी नीतियों का पूरी ताकत के साथ विरोध किया और मुगलों से जीवन भर संघर्ष करते रहे ! मुगलों से सिख वर्चस्व की लड़ाई में उन्होंने अपने बेटों की कुरबानी दे दी और 18 अक्टूबर, 1708 को 42 वर्ष की आयु में नान्देड में स्वयं भी शहीद हो गए ।

       उनकी वीरता का अंदाजा, उनके द्वारा कही गयी इन पंक्तियों से लगाया जा सकता है ;

वो कहते थे…..

“सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ, तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ”

तो आइये ! ऐसे बलिदानी महापुरुष के जीवन से प्रेरणा लें और देश-सेवा में जितना ज्यादा हो सके, उतना अधिक योगदान दें — क्यूंकि यदि सबसे बड़ा प्रेम है, तो वो है मातृभूमि से प्रेम !

 


खुला आमंत्रण


 

दोस्तो, 
        यदि, आपके पास Hindi/English या Hinglish में कोई  motivational story, article, कविता, idea, essay, real life experience या कोई जानकारी  या  कुछ  भी ऐसा जिसे पढ़कर कुछ अच्छी सीख मिले ( चाहें वो आपके अपने मन से वयक्त किये गए हों या आपने कहीं पढ़े हों ) ……………… 

        जिसे आप हमसे share करना चाहते हैं ।

        तो, आप अपना कंटेंट (content) मुझे  info@motivatemyindia.com  पर mail कर सकते हैं  आपसे अनुरोध है कि (content) के साथ अपना एक फोटो भी भेजें।

        पसंद आने पर आपका कंटेंट जल्दी ही आपकी फोटो के साथ पर आपकी अपनी websitewww.motivatemyindia.com प्रकाशित कर दिया जाएगा ।  

धन्यवाद!!!

 

TAGS
RELATED POSTS

1 Comment on महान वीर और महा बलिदानी व्यक्तित्व : गुरु गोविन्द सिंह जी

Amul Sharma said : Guest Report 9 months ago

Guru govind singh ji ke bare me bahut acchi jankari di hai aapne......mere favorite person hain yeh....thanks for sharing.........

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked