PRANAV BHARDWAJ
Motivational Speaker / Writer

दोस्तो, मेरी हमेशा से यही कोशिश रही कि मैं कुछ ऐसा करूँ, जिससे देश/समाज में रचनात्मक व सकारात्मक परिवर्तन (Creative & Positive change) आ सके। मैंने अपनी इसी सोच के तहत परम पिता परमेश्वर के आशीर्वाद से यह website बनायी है.......

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geewan
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जीवन v / s  सार्थक जीवन 

By on December 8th, 2016

 

जीवन

v / s 

 सार्थक जीवन 

 

दोस्तो,

   बहुत समय पहले की बात है ! एक राज्य में रघुवर प्रताप नामक, एक राजा राज्य करते थे ! राजा की एक रानी और तीन पुत्र थे ! राजा रघुवर प्रताप, अपने राज्य में बहुत लोकप्रिय और न्यायप्रिय राजा के रूप में जाने जाते थे ! वो अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे ! उनके नेतृत्व में राज्य तेजी से प्रगति की ओर बढ़ रहा था ! राज्य की प्रजा बहुत खुश थी !

     धीरे-धीरे समय बीतने लगा ! राजा को एक बात, मन ही मन परेशान करने लगी ! राजा सोचने लगे कि मेरे तीन पुत्र हैंतीनों में से किस पुत्र को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनुं ??? ताकि वो इस राज्य का कुशलता पूर्वक संचालन कर सके !

     उन्होंने अपनी इस चिंता को अपने राज-गुरु जी को बताया !

गुरु जी ने राजा की बात, ध्यान से सुनी और कहा : इसके समाधान के लिए राजन, तुमको एक काम करना होगा !

राजा : जी, बताइए…..

गुरु जी : राजा, मैं आपको तीन थैलियाँ दुंगा ! इन तीनों थैलियों में फलदार और छायादार पेड़ों के बीज हैं ! तुमको ये तीनों थैली, अपने तीनों पुत्रों को देनी है ! आज से ठीक 5 वर्ष बाद, मैं आपके राज दरबार में आऊंगा ! और आपके तीनों पुत्रों से, अपनी यह बीजों की थैलियाँ वापस लुँगा !

राजा : क्या ऐसा करने से, मेरी समस्या का हल हो जाएगा ?

गुरु जी : राजन ! आप निश्चिंत रहिये !

राजा बहुत खुश हुए ! उन्होंने गुरु की आज्ञा के अनुसार काम किया !

         राजा ने अपने तीनों पुत्रों को बुलाया और कहा कि, मेरे पास तीन थैलियाँ  हैं – और सब थैलियों में कुछ फलदार और छायादार पेड़ों के बीज हैं ! तुम तीनों की यह जिम्मेदारी है कि तुम, अपनी-अपनी थैलियों के बीजों को संभाल के रखना और आज से ठीक 5 वर्ष बाद, हमारे राज्य के राज-गुरु आयेंगे – तब, तुम सभी को अपनी-अपनी  थैलियाँ उनको वापस करनी हैं ! ध्यान रहें बीज सुरक्षित रहने चाहिए !

     सबसे बड़े पुत्र ने सोचा कि, ऐसे तो यह थैली कहीं गुम हो जाएगी ! यदि इसे सुरक्षित रखना है, तो मुझे इसको कहीं उचित स्थान पर रखना होगा ! उसने इस थैली को लोहे की एक अलमारी में रखकर बाहर से ताला लगा दिया, और निश्चिंत हो गया !

     राजा के दूसरे पुत्र ने सोचा कि, यदि इन बीजों को ऐसे ही रखा, तो 5 वर्षों में तो यह यह खराब हो जाएँगे – तो क्यूँ न इन बीजों को एक खेत में लगा दिया जाए ! उसने सोचा कि आज से 5 वर्ष बाद जब गुरूजी इन पेड़ों को देखेंगे, तो वो बहुत खुश होंगे ! उसने एक खेत में इन बीजों को डलवा दिया ! इसके बाद न तो वो कभी इनको देखने गया और न ही इनकी देखभाल की कोई उचित व्यवस्था की ! उसने सोचा कि, यह तो ऐसे ही बड़े हो जाएँगे !

     तीसरे पुत्र ने थोड़ी समझदारी से काम लिया ! उसने एक अच्छा सा खेत देखा ! उसमें उचित खाद-पानी डलवाकर, मिटटी को उपजाऊ बनवाया और फिर उस साफ़ जमीन में उन बीजों को डाला ! वो समय-समय पर उनकी देखभाल करता था !

     5 वर्ष पूरे होने को थे ! राजा और उनके पुत्र बड़ी बेसब्री के साथ गुरूजी का इंतज़ार करने लगे ! राजा, अपनी समस्या के समाधान को लेकर बहुत उत्साहित था !

नियत समय पर गुरु जी आये और राजा के तीनों पुत्रों से अपनी-अपनी बीजों की थैलियाँ वापस लौटाने को कहा !

                पहले बेटे ने जैसे ही अलमारी खोली – उसमें से बहुत तेज बदबू आ रही थी ! सब कुछ सड चूका था ! गुरु जी बहुत क्रोधित हुए और बोले पुत्र, तुम्हें मैंने इतना छोटा सा काम दिया था और तुम उसे भी ठीक से नहीं कर पाए ! तुमसे और क्या उम्मीद की जा सकती है ???

                दूसरा बेटा राजा और गुरु जी को ख़ुशी-ख़ुशी उस खेत में लेकर गया, जहाँ उसने उन बीजों को डलवाया था ! लेकिन क्यूंकि उसने उस खेत की देखभाल ही नहीं की और न ही वहां की मिटटी उपजाऊ थी — अतः वहां कुछ भी नहीं था, वहां तो बहुत बड़ी घास-फूस थी !

     गुरु जी बहुत नाराज हुए और बोले बेटा, तुमसे यह उम्मीद न थी ! यदि तुमने यहाँ बीज लगाए थे, तो तुम्हे उन बीजों की उचित देखभाल करनी थी ताकि वो बीज अंकुरित होकर पेड़ बन पाते ! तुम इन बीजों की थैली को ही नहीं संभाल पाए, तो इतने बड़े राज्य को कैसे संभाल सकते हो ???

     गुरु जी बहुत गुस्से में थे ! उन्होंने क्रोधित स्वर में तीसरे पुत्र से पुछा : बेटा तुम्हारी थैली कहाँ है ?

     बेटा उन्हें और राजा को उस जगह ले गया, जहाँ उसने इन बीजों को लगाया था ! वहां का दृश्य बहुत ही मनोरम था ! वहां तरह-तरह के खुशबूदार और फलदार वृक्ष खड़े थे ! राजा और गुरूजी बहुत खुश हुए !

     राजा, अब पूरी बात समझ चुका था ! उसने, ख़ुशी-ख़ुशी गुरूजी के पैर छुए और कहा : गुरु जी आपने इतनी समझदारी और सरलता से मेरी इतनी बड़ी समस्या का समाधान कर दिया ! अब मैं बहुत खुश हूँ !

     राजा बहुत आनंदित था ! उसके मन से इतना बड़ा, बोझ जो हट गया था ! उसने ख़ुशी-ख़ुशी अपने तीसरे पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया !

दोस्तो,

       यही तो हम सभी लोगों के साथ होता है ! परम-पिता-परमेश्वर ने भी हम सभी को अच्छाई / भलाई के बीजों से भरी एक थैली दी है, और वो थैली है — हमारा अमूल्य जीवन !

       परमात्मा हमसे यह चाहता है कि, हम सभी अपने जीवन को अच्छे से जीयें और अपने विकास के साथ-साथ समाज और देश के विकास में अपना ज्यादा से ज्यादा योगदान देकर अपना जीवन सफल बनायें !

       लेकिन अधिकांश लोग केवल, अपने और अपने परिवार के लिए ही जीते हैं ! उनका पूरा जीवन अपना और अपने परिवार का भविष्य बनाने में ही गुजर जाता है – उनके जीवन का केवल एक ही मकसद होता है, कि वो अपने जीवन में इतनी दौलत इकट्ठी कर जाएं, जिससे उनकी आने वाली पीढ़ियों को कुछ भी करने की जरूरत ही न पड़े ! और वो जीवन भर अपनी इसी कोशिश में लगे रहते हैं ! वो चाहकर भी समाज की भलाई या विकास के लिए कुछ नहीं करते !

       जबकि बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने मन से हर तरह की घास-फूस ( ईर्ष्या, द्वेष, लालच, व्यसन, गलत आदतों ) आदि को हटाकर, अच्छाई के बीज बोते हैं और अपने जीवन के साथ-साथ अपने प्यारे समाज और महान देश के लिए जीते हैं ! समाज – देश की भलाई और विकास में अपना ज्यादा से ज्यादा योगदान देते हैं, सच में, वो ही अपना जीवन साकार कर पाते हैं !

दोस्तो,

       यह कटु सत्य है कि जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है !

       तो क्यूँ न हम, अपने इस जीवन को अच्छे से जीयें और अपने जीवन के साथ-साथ समाज और देश निर्माण में जितना संभव हो सके अधिक से अधिक योगदान दें, तभी हमारा जीवन सच्चे अर्थों में कामयाब होगा !

       तो आइये ! अपने जीवन – जीने का एक मकसद बनाएं और ख़ुशी-ख़ुशी जीवन जीयें – ताकि जब परमात्मा हमसे यह जीवन रुपी – थैली वापस मांगे — तो हम उन्हें,  अपने इस जीवन में किये गये कुछ नेक और अच्छे काम बता सकें — और अपने इस अमूल्य जीवन को सार्थक जीवन में बदलकर एक सुखी, स्वस्थ, मस्त और खुश-हाल जीवन के मालिक बनें

(inspired by panch-tantra stories)

जय हिन्द ! जय भारत

आपका अपना मित्र

प्रणव भारद्वाज


खुला आमंत्रण


 

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