PRANAV BHARDWAJ
Motivational Speaker / Writer

दोस्तो, मेरी हमेशा से यही कोशिश रही कि मैं कुछ ऐसा करूँ, जिससे देश/समाज में रचनात्मक व सकारात्मक परिवर्तन (Creative & Positive change) आ सके। मैंने अपनी इसी सोच के तहत परम पिता परमेश्वर के आशीर्वाद से यह website बनायी है.......

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ख़ुशी : हमारी मुट्ठी में

By on April 27th, 2016

 

ख़ुशी : हमारी मुट्ठी में

 

 

       एक गाँव में मोहन नाम का एक लड़का रहता था । मोहन पढ़ने में बहुत होशियार था । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण, मोहन को अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था । मोहन अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को Tution देता था और इस तरह उसने गाँव के स्कूल से १२ वी तक की पढ़ाई पूरी की । उसने शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से B.Com पास किया और शहर में एक Private Company में Job करने लगा । उसने नौकरी के साथ-साथ एक यूनिवर्सिटी से M.B.A किया । कंपनी में उसका Promotion हो गया अब उसे अच्छा वेतन (Salary) मिलने लगा । मोहन की आर्थिक-स्थिति अच्छी होने लगी, इससे खुश होकर मोहन ने अपने लिए एक मोटर-साइकिल खरीद ली । वह रोज अपनी इस मोटर-साइकिल से बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी अपनी job पर जाता और खूब खुश रहता । वो अपने आप से खुश था । उसे इस बात की ख़ुशी थी, कि वो अपनी मेहनत के दम पर आज एक अच्छी, आरामदायक और सम्मान-जनक नौकरी कर रहा था ।  

     एक दिन मोहन अपनी मोटर-साइकिल से कहीं जा रहा था । गर्मी के दिन थे, बाहर एक दम चिल-चिलाती धूप पड रही थी । Traffic Light, Red होने के कारण, मोहन अपनी मोटर-साइकिल रोक-कर, Traffic Light, के Green होने का इंतज़ार करने लगा, कि तभी एक नयी और चमचमाती कार उसके पास आकर रुकी । कार में एक व्यक्ति जो लगभग मोहन की उम्र का था बड़ी शान से बैठा हुआ था और ड्राईवर गाड़ी चला रहा था ।

    मोहन सोचने लगा, “एक हम हैं, जो इतनी मेहनत के बाद भी एक मोटर साइकिल ही ले पाए हैं और यहाँ धूप में खड़े हुए हैं, और एक यह लड़का है जो आराम से अपनी गाड़ी में A.C में बैठा हुआ है । सच में यह होती है जिंदगी, हमारी जिंदगी भी कोई जिंदगी है क्या ??? ”

    वो मन ही मन दु:खी होने लगा । वह सोच रहा था, की मेरी जिंदगी तो केवल मेहनत करने के लिए ही हुई है । ऐसा सोचकर वो निराश हो गया । तभी उसने साइकिल चलाते हुए 3 व्यक्तियों को देखा । वो लोग काफी थके हुए लग रहे थे । धूप के कारण उनके शरीर से पसीना छूट रहा था और वो हांफ रहे थे । लेकिन इतनी तकलीफ में भी वो साइकिल चला रहे थे ।

     अब मोहन की सोच बदल गयी वो सोचने लगा, “ इन लोगों की जिंदगी कितनी कठिन है? यह इतनी चिल-चिलाती धूप में कितनी कठिनाई से अपना जीवन जी रहे है?

     मोहन ने खुद से कहा “मैं इन लोगों के मुकाबले ज्यादा सुखी हूँ और भाग्य-शाली भी । मुझे इतनी कठिन मेहनत तो नहीं  करनी पड़ रही है”  

     उसे इस बात का एहसास हो गया कि, वो कुछ लोगों के मुकाबले दुखी है पर ज्यादातर लोगों के मुकाबले ज्यादा सुखी है । उसे समझ आ गया की ये सुख-दुःख सब मनुष्य की सोच का ही परिणाम है । अभी जब मैं इस कार वाले व्यक्ति से अपनी तुलना कर रहा था तो मैं काफी निराश था, लेकिन जब मैंने साइकिल वाले लोगों की कठिनाइयों को समझा तो अब मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया । वो मन ही मन अपनी गलती पर हंसने लगा कि तभी पीछे से किसी ने बहुत तेज Horn बजाया । Traffic Light, Green हो चुकी थी, वह अपने रास्ते ख़ुशी-ख़ुशी आगे बढ़ गया ।  

दोस्तो,

      कितनी विचित्र बात है ?

      मोहन, जो अपनी जिंदगी से पूरी तरह खुश था । जिसे इस बात का गर्व था की काफी कठिनाइयों को पार करके आज वह एक आरामदायक और सम्मान-जनक जिंदगी जी रहा है । जब वह यह सोचता है कि वह दु:खी है, तो वह अपने आपको दुखी पाता है, और निराश होने लगता है लेकिन जब वह सोचता है की वह सुखी है, तो दुसरे ही पल वह सुखी हो जाता है । जबकी परिस्थितियां भी समान हैं और व्यक्ति(मोहन) भी एक ही है । अंतर है तो सिर्फ सोच का ।

     यहाँ यह कहा जा सकता है कि हमारा खुश रहना या दु:खी रहना पूरी तरह से हमारे हाथ में है । हम जैसा सोचेंगे, हम उसी दिशा में अपने आप को पाएंगे ।

दोस्तो,

     जब भी हमें कोई वस्तु/चीज अच्छी लगती है, तो हम उसे पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं और सोचते हैं की जब यह चीज हमारी हो जाएगी तो हम खुश हो जाएँगे लेकिन एक बार उसे पाने के बाद, कुछ दिनों तक खुश होने के बाद हम फिर कोई दूसरी वस्तु-विशेष देखते हैं और फिर दौड़ने लगते हैं । और जाने-अनजाने में एक ऐसी दौड़ में शामिल हो जाते हैं जिसका कोई अंत ही नहीं है ।

     जबकि सच बात तो यह है कि जिस ख़ुशी को हम इधर-उधर देखते हैं और उसे पाने को पूरी जिंदगी दौड़ेते है वो और कहीं नहीं बल्कि हमारे अन्दर ही हैं । हमारी अपनी सोच में क्योंकि यह सुख-दुःख सब हमारी सोच पर ही निर्भर होता है । जब हम सोचते हैं की हम खुश हैं तो हम सभी चीजों को उसी तरह से देखते हैं और हम अपने आपको खुश पाते हैं लेकिन जब हम सोचते हैं की हम दुखी हैं तो हम दुखी हो जाते हैं ।  

     इस सम्बन्ध में मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है “वो कहते हैं कि लोग उतने ही प्रसन्न/खुश होते हैं, जितना वो प्रसन्न रहने का विकल्प चुनते हैं । यदि आप दु:खी रहना चाहते हैं, तो आप बड़े आराम से दु:खी रह सकते हैं क्योंकि यह दुनिया का सबसे आसान काम है । केवल दु:खी रहने का विकल्प चुन लें और अपने आप से कहते रहें की हर तरफ बुरा हो रहा है, कोई भी काम ठीक तरह से नहीं हो रहा है, चारों तरफ परेशानी ही परेशानी है तो आप सचमुच में ही दु:खी हो जाएँगे ।  

           और यदि आप इसके बजाय खुद से कहेंगे कि “हर चीज अच्छी तरह हो रही है, जिंदगी बहुत बढ़िया है । मैं सुखी रहने का विकल्प चुनता हूँ और तब आप सच-मुच खुश हो जाओगे”

दोस्तो,

             क्या आपने कभी, किसी पशु-पक्षी को मुस्कुराते हुए देखा है ???

              शायद – नहीं, बिलकुल भी नहीं !

     आपको जानकर यह ख़ुशी होगी की परम-पिता-परमेश्वर ने खुश/प्रसन्न रहने का वरदान केवल और केवल हम इंसानों को ही दिया है ।

 

         तो आइये, खुश रहने की इस कला को अपने जीवन का एक अभिन्न अंग बनायें और जीवन में  अपनी सफलता सुनिश्चित कीजिए ।

आपका अपना दोस्त

प्रणव भारद्वाज

 


 खुला आमंत्रण


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